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Monday, January 13, 2020

January 13, 2020

Maa Bata Mujhe By Nidhi Narwal – Poem | Immature Ink


This Beautiful Poem 'Maa Bata Mujhe' which is written and performed by Nidhi Narwal.


Maa Bata Mujhe

मां तू कमजोर तो नहीं है ये मैं जानती हूं 
पर मुझे बात करनी है तुमसे 
और बात दरअसल ये है कि मैं ये चाहती हूं 
कि आज तू बात करें मुझसे 
तू ठीक है ना? तूने खाना खाया? दवाई ली? 
घर पर सब कैसे हैं? 
अच्छा... शहर का मौसम, तेरी तबीयत सब
कैसा है? 
तू ठीक है ना? मेरी याद आती है ना? मैं घर आंऊ
ये सब नहीं जानना मुझे 
इन सब के जवाब तो मुझे पहले से पता है
 क्योंकि बरसों से ये सवाल और इनके जवाब बदले नहीं है 
मुझे तुझसे वो जानना है जो तेरी आंखों के बगल में पड़ा नील चीख चीख कर मुझे बताता है 
बच्ची नहीं हूं मां अब बड़ी हो गई हूं 
कहानियां सुनकर नींद नहीं आती है
बता वो सच्चाई जो तेरे होठों पर बर्फ के जैसी जमी रखी है 
बता वो सब मुझे जिसका शोर तेरी चुप्पी से साफ-साफ सुनाई देता है
बता वो किस्सा जो तेरी पीठ पर मुझे हर बार दिखाई देता है 
तेरे सुर्ख गालों पर मेहरून और नीले धब्बे हैं 
जो घूंघट के पीछे तूने सालों तक रखे हैं 
मगर मुझे नजर आते हैं 
मां तू कितनी भोली है तेरी चूड़ियां तेरी कलाई के​ चोट छुपा नहीं पाती 
तेरी हालत सब बताती है तू खुद बता क्यों नहीं पाती? 
कि तेरे फर्ज के बदले कौन से किस किस्म के तोहफे हैं ये? 
तेरे जीस्त के आखिर कौन सी किताब के सफे है ये 
मुझे बता मैं वो किताब फाड़ कर कहीं फेंक दूंगी 
ये तौफे देने वाले को मेरा वादा है तुझसे 
ये तौफे वापस सूत समेत दुंगी 
मां मैं तेरी बेटी हूं मैं तेरी बेटी हूं। इतना काबिल तूने बनाया है मुझे 
कि पैर में चुभा कांटा खुद निकाल कर फेंक सकूं
गुनाहगार और गुनाह के मुंह पर एक तमाचा टैक सकूं 
मां बता मुझे माथे पर सिंदूर की जगह ये खून क्यों रखा है तेरा? 
इसे रखने वाला सच सच बता पिता है मेरा 
मुझे शर्म नहीं आएगी 
अरे कोई मोहब्बत का इजहार है क्या? 
तू बोल तो सही... तु बोलती क्यों नहीं? 
मां तेरे हकों का ऐतबार है क्या?
मैं कमजोर नहीं हूं...
मैं कमजोर बिल्कुल नहीं हूं 
मां मगर मुझसे बात कर वरना शायद कमजोर पड़ जाऊं।

                                    – Nidhi Narwal 




Saturday, May 18, 2019

May 18, 2019

Kedarnath Singh Ki Kavitaye - Jeevan Parichay | केदारनाथ सिंह की कविताएं - जीवन परिचय

Famous Poems Of Kedarnath Singh | केदारनाथ सिंह की प्रसिद्ध कविताएं


केदारनाथ सिंह एक भारतीय कवि थे। ये अपनी कविताएं हिन्दी में लिखा करते थे। इनकी प्रमुख रचनाओं में अकाल में सारस, बाघ, उत्तर कबीर तथा अन्य कविताएँ, अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, 'रोटी', 'जमीन', बैल, 'तालस्ताय' और 'साइकिल संग्रह', जैसे कई संग्रह हैं। उन्हें कविता संग्रह "अकाल में सारस" के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार (1989), मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल), दिनकर पुरस्कार, जीवनभारती सम्मान (उड़ीसा) और व्यास सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

कविताएं | केदारनाथ सिंह


केदारनाथ सिंह का जीवन परिचय:


केदारनाथ सिंह एक भारतीय कवि थे। ये अपनी कविताएं हिन्दी में लिखा करते थे। इनकी प्रमुख रचनाओं में अकाल में सारस, बाघ, उत्तर कबीर तथा अन्य कविताएँ, अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, 'रोटी', 'जमीन', बैल, 'तालस्ताय' और 'साइकिल संग्रह', जैसे कई संग्रह हैं। उन्हें कविता संग्रह "अकाल में सारस" के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार (1989), मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल), दिनकर पुरस्कार, जीवनभारती सम्मान (उड़ीसा) और व्यास सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

वर्तमान दौर के हिन्दी साहित्य में अपनी कविता के माध्यम से लोगों के दिलो पर छा जाने वाले प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह का जन्म 20 नवम्बर सन् 1934 में बलिया जिले के चकिया गाँव में एक किसान परिवार में हुआ था, इनके पिता का नाम डोमन सिंह एवं माता का नाम लालझरी देवी था, इनका गाँव चकिया लगभग पांच हजार की आबादी वाला गाँव है तथा इसकी स्थिति बलिया जिले के अंतिम पूर्वी छोर पर गंगा एवं सरयू नदी की गोद में बसी हुई है !

केदारनाथ सिंह की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा उनके गाँव बलिया में ही प्राथमिक विद्यालय में हुई, अपने गाँव में आठवीं की शिक्षा प्राप्त करने के बाद केदारनाथ सिंह बनारस चले आये और यहीं पर इंटर की पढ़ाई करने के साथ ही उदय प्रताप कालेज(UP College) से स्नातक तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय(BHU) से हिंदी में परास्नातक की शिक्षा प्राप्त किया और परास्नातक की शिक्षा पूरी होने के बाद सन् 1964 ई० में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय(BHU) से आधुनिक हिन्दी कविता में बिम्ब-विधा ’ विषय पर
 पी०एचडी० की उपाधि प्राप्त की।

केदारनाथ सिंह का जीवन काफी उतार-चढ़ाव से भरा रहा। इन्होंने अपनी पहली नौकरी सन् 1969 ई० में पड़रौना के एक कालेज से शुरू किया जो की  जीवन के आर्थिक संकट के दौरान इन्होंने अपनी पहली नौकरी सन् 1969 ई० में पड़रौना के एक कालेज से शुरू किया, और ऐसा कहा जाता है की पड़रौना में नौकरी के दौरान इनकी पत्नी की तबियत काफी ख़राब हो गयी थी और कुछ ही दिनों के बाद इनकी पत्नी का निधन हो गया था जो की इनके जीवन का एक दुर्भाग्यपूर्ण हिस्सो में से एक था।

इनके परिवार में इनकी पांच बेटियाँ एवं एक बेटा है, कुछ दिनों तक केदारनाथ सिंह ने अपनी सेवा गोरखपुर के सेंटएड्रयूज कालेज में भी दिया था और यहाँ के बाद इनकी नियुक्ति देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय(JNU) नई दिल्ली में हिंदी विभाग में हुई थी।

केदारनाथ सिंह की कविताएं शब्दों का श्रृंगार हैं । उसके अर्थ नए हैं , उसकी प्रतीतियां नई हैं । उनकी कविता हमेशा पुनर्नवा और तरोताजा दिखती हैं और युवा लेखकों को भी बहुत भाती है।

जीवन के अंतिम काव्य-संग्रह में इन्होनें “जाऊँगा कहाँ” को अपनी अंतिम कविता के रूप में रखा जिसकी कुछ लाइनें संसार से विदा होने के संकेतों को साफ समझा जा सकता है....!

जाऊंगा कहाँ, रहूँगा यहीं
किसी किवाड़ पर, हाथ के निशान की तरह
पड़ा रहूंगा किसी पुराने ताखे, या सन्दुक की गन्ध में

 19 मार्च 2018 ई० को नई दिल्ली के एम्स में इलाज के दौरान संसार को अलविदा कह दिया !


साहित्य जगत, रचनाएं और सम्मान:


केदारनाथ सिंह एक भारतीय कवि थे। ये अपनी कविताएं हिन्दी में लिखा करते थे। इनकी प्रमुख रचनाओं में अकाल में सारस, बाघ, उत्तर कबीर तथा अन्य कविताएँ, अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, 'रोटी', 'जमीन', बैल, 'तालस्ताय' और 'साइकिल संग्रह', जैसे कई संग्रह हैं। उन्हें कविता संग्रह "अकाल में सारस" के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार (1989), मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल), दिनकर पुरस्कार, जीवनभारती सम्मान (उड़ीसा) और व्यास सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

साहित्य जगत में यह एक विख्यात लेखक के रूप में जाने जाते है। ये दिल्ली में रहकर भी बलिया और बनारस की मिट्टी को भुले नहीं थे, वो इन्हें अपने रचनाओं के द्वारा याद किया करते थे और इसे अपने पास पाते थे। इनकी प्रमुख रचनाओं में अकाल में सारस, बाघ, उत्तर कबीर तथा अन्य कविताएँ, अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, 'रोटी', 'जमीन', बैल, 'तालस्ताय' और 'साइकिल संग्रह', जैसे कई संग्रह हैं। उन्हें कविता संग्रह "अकाल में सारस" के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार (1989), मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल), दिनकर पुरस्कार, जीवनभारती सम्मान (उड़ीसा) और व्यास सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें साहित्य के प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ सम्मान 2013 के लिए चुना गया। वे हिंदी के 10 वें रचनाकार हैं, जिन्हें यह पुरस्कार दिया गया है। केदारनाथ सिंह के 'अभी बिल्कुल अभी', 'यहां से देखो', 'अकाल में सारस', 'बाघ' जैसे कविता संग्रह बहुत प्रसिद्ध रहे हैं।


May 18, 2019

Ek Mukut Ki Tarah - Kedarnath Singh | Hindi Kavita

एक मुकुट की तरह | केदारनाथ सिंह 


'एक मुकुट की तरह' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक छोटी हिन्दी कविता है।

केदार जी को प्रकृति से बहुत लगाव रहता था ऐसा उनके कविताओं में साफ देखने को मिलता है। जब भी कोई विचित्र या अनोखा बिंब उन्होंने दिखाई देता है वो झट से इसे कविताबद्ध कर देते ताकि ये आजीवन जीवित रहे इन कविताओं में। 'अकाल में सारस' नामक कविता-संग्रह में‌‌ संकलित यह हिन्दी कविता 'एक मुकुट की तरह' भी है।

एक मुकुट की तरह

पृथ्वी के ललाट पर
एक मुकुट की तरह
उड़े जा रहे थे पक्षी

मैंने दूर से देखा
और मैं वहीं से चिल्लाया
बधाई हो
पृथ्वी, बधाई हो !

                                             – केदारनाथ सिंह

Prithvi ke lalaat par
Ek mukut ki tarah
Ude ja rahe the pakshi

Maine dur se dekha
Aur main wahin se chillaaya
Badhaai ho
Prithvi, badhaai ho !

                                   – Kedarnath Singh





May 18, 2019

Ek Din Hansi Hansi Mein - Kedarnath Singh | Hindi Kavita

एक दिन हँसी-हँसी में | केदारनाथ सिंह 


'एक दिन हँसी-हँसी में' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक हिन्दी कविता है।

'अकाल में सारस' नामक कविता-संग्रह में‌‌ संकलित यह हिन्दी कविता 'एक दिन हँसी-हँसी में' केदारनाथ जी प्रसिद्ध कविताओं में से एक है।

एक दिन हँसी-हँसी में

एक दिन
हँसी-हँसी में
उसने पृथ्वी पर खींच दी
एक गोल-सी लकीर
और कहा - 'यह तुम्हारा घर है'
मैंने कहा -
'ठीक, अब मैं यहीं रहूँगा'

वर्षा
शीत
और घाम से बचकर
कुछ दिन मैं रहा
उसी घर में

इस बात को बहुत दिन हुए
लेकिन तब से वह घर
मेरे साथ-साथ है
मैंने आनेवाली ठंड के विरुद्ध
उसे एक हल्के रंगीन स्वेटर की तरह
पहन रखा है।

                                      – केदारनाथ सिंह


Ek din
Hansi-hansi mein
Usne prithvi par khinch di
Ek gol-si lakeer
Aur kaha - 'yah tumhara ghar hai'
Maine kaha -
'Thik, ab main yahin rahunga'

Varsha
Shit
Aur ghaam se bachkar
Kuch din main raha
Usi ghar mein

Is baat ko bahut din hua
Lekin tab se wah ghar
Mere saath-saath hai
Maine aane wali thand ke viruddh
Use ek halke rangin swetar ki tarah
Pahan rakha hai.

                                     – Kedarnath Singh


Friday, May 17, 2019

May 17, 2019

Shaam Bech Dee Hai - Kedarnath Singh | Hindi Kavita

शाम बेच दी है | केदारनाथ सिंह 


'शाम बेच दी है' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक हिन्दी कविता है।

शाम बेच दी है

शाम बेच दी है
भाई, शाम बेच दी है
मैंने शाम बेच दी है!

वो मिट्टी के दिन, वो घरौंदों की शाम,
वो तन-मन में बिजली की कौंधों की शाम,
मदरसों की छुट्टी, वो छंदों की शाम,
वो घर भर में गोरस की गंधों की शाम
वो दिन भर का पढ़ना, वो भूलों की शाम,
वो वन-वन के बाँसों-बबूलों की शाम,
झिड़कियाँ पिता की, वो डाँटों की शाम,
वो बंसी, वो डोंगी, वो घाटों की शाम,
वो बाँहों में नील आसमानों की शाम,
वो वक्ष तोड़-तोड़ उठे गानों की शाम,
वो लुकना, वो छिपना, वो चोरी की शाम,
वो ढेरों दुआएँ, वो लोरी की शाम,
वो बरगद पे बादल की पाँतों की शाम
वो चौखट, वो चूल्हे से बातों की शाम,
वो पहलू में किस्सों की थापों की शाम,
वो सपनों के घोड़े, वो टापों की शाम,

वो नए-नए सपनों की शाम बेच दी है,
भाई, शाम बेच दी है, मैंने शाम बेच दी है।

वो सड़कों की शाम, बयाबानों की शाम,
वो टूटे रहे जीवन के मानों की शाम,
वो गुंबद की ओट हुई झेपों की शाम,
हाट-बाटों की शाम, थकी खेपों की शाम,
तपी साँसों की तेज रक्तवाहों की शाम,
वो दुराहों-तिराहों-चौराहों की शाम,
भूख प्यासों की शाम, रुँधे कंठों की शाम,
लाख झंझट की शाम, लाख टंटों की शाम,
याद आने की शाम, भूल जाने की शाम,
वो जा-जा कर लौट-लौट आने की शाम,
वो चेहरे पर उडते से भावों की शाम,
वो नस-नस में बढ़ते तनावों की शाम,
वो कैफे के टेबल, वो प्यालों की शाम,
वो जेबों पर सिकुड़न के तालों की शाम,
वो माथे पर सदियों के बोझों की शाम
वो भीड़ों में धड़कन की खोजों की शाम,

वो तेज-तेज कदमों की शाम बेच दी है,
भाई, शाम बेच दी है, मैंने शाम बेच दी है।

                                      – केदारनाथ सिंह


Thursday, May 16, 2019

May 16, 2019

Shahar Me Raat - Kedarnath Singh | Hindi Kavita

शहर में रात | केदारनाथ सिंह 


'शहर में रात' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक हिन्दी कविता है।

1982 में लिखी केदारनाथ की कविता 'शहर में रात' कविता-संग्रह 'यहां से देखो' से ली गई है। इस कविता में संघर्ष और कभी न खत्म होने वाली इच्छाओं का जिक्र है। कविता में केदार जी ने बखूबी चित्रण करते हुए कहा है कि पुरा शहर बदल ही क्यों ना जाए पर कुछ चीजें नहीं बदल सकती आज भी बिजली के चमकने और पानी के गिरने का डर, लोग आज भी आजीविका के स्तर और जिंदगी की जद्दोजहद में कोई बदलाव नहीं है।

शहर में रात 

बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है
वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर है
वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा
वह क्या है जो दिखता है धुआँ-धुआँ-सा
वह क्या है हरा-हरा-सा जिसके आगे
हैं उलझ गए जीने के सारे धागे
यह शहर कि जिसमें रहती है इच्छाएँ
कुत्ते-भुनगे-आदमी-गिलहरी-गाएँ
यह शहर कि जिसकी जिद है सीधी-सादी
ज्यादा-से-ज्यादा सुख सुविधा आजादी
तुम कभी देखना इसे सुलगते क्षण में
यह अलग-अलग दिखता है हर दर्पण में
साथियों, रात आई, अब मैं जाता हूँ
इस आने-जाने का वेतन पाता हूँ
जब आँख लगे तो सुनना धीरे-धीरे
किस तरह रात-भर बजती हैं जंजीरें

                                       – केदारनाथ सिंह



Bijli chamki, paani girne ka dar hai
Ve kyon bhage jaate hain jinke ghar hai
Ve kyon chup hain jinko aati hai bhasha
Wah kya hai jo dikhta hai dhuaan-dhuaan-sa
Wah kya hai hara-hara-sa jiske aage
Hain ulajh gaye jeene ke saare dhage
Yah shahar ki jisme rahti hai ichhayen
Kutte-bhunge-aadmi-gilahri-gayen
Yah shahar ki jiski zid hai sidhi-saadi
Jyada-se-jyada sukh suwidha aazadi
Tum kabhi dekhna ise sulgte kshan mein
Yah alag-alag dikhta hai har darpan mein
Sathiyon, raat aayi, ab main jata hoon
Is aane-jaane ka vetan paata hoon
Jab aankh lage to sunna dheere-dheere
Kis tarah raat-bhar bajti hain janjeerein.

                                – Kedarnath Singh



May 16, 2019

Lokkatha - Kedarnath Singh | Hindi Kavita

लोककथा | केदारनाथ सिंह 


'लोककथा' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक हिन्दी कविता है।

इस कविता में उस लोक कथा का जिक्र है जो सदियों से लोक में प्रचलित है , लेकिन केदार जी की यह एक खास विशेषता है कि वे लोककथा कविता में लोक की विडंबनाओं को उद्घाटित करने से नहीं चुकते । इस तरह लोक और लोक संस्कृति का उद्घाटन करना कवि का मुख्य उद्देश्य नहीं रह जाता , बल्कि लोक में विद्यमान विडंबनाओं की ओर भी संकेत करना उनका लक्ष्य होता है । 'अकाल में सारस' कविता-संग्रह  में संकलित यह कविता 'लोककथा' भी है।

लोककथा

जब राजा मरास
सोने की एक बहुत बड़ी अर्थी बनाई गई
जिस पर रखा गया उस का शव
शानदार शव जिसे देखकर
कोई कह नहीं सकता
कि वह राजा नहीं है

सबसे पहले मंत्री आया
और शव के सामने
झुककर खड़ा हो गया

फिर पुरोहित आया
और न जाने क्या
कुछ देर तक होठों में बुदबुदाता रहा
फिर हाथी आया
और उसने सूँड़ उठाकर
शव के प्रति सम्मान प्रकट किया
फिर घोड़े आए नीले-पीले
जो माहौल की गंभीरता को देखकर
तय नहीं कर पाए
कि उन्हें हिनहिनाना चाहिए या नहीं
फिर धीरे-धीरे
बढ़ई
धोबी
नाई
कुम्हार - सब आए
और सब खड़े हो गए
विशाल चमचमाती हुई अर्थी को घेरकर

अर्थी के आसपास
एक अजब-सा दुख था
जिसमें सब दुखी थे
मंत्री दुखी था
क्योंकि हाथी दुखी था
हाथी दुखी था
क्योंकि घोड़े दुखी थे
घोड़े दुखी थे
क्योंकि घास दुखी थी
घास दुखी थी
क्योंकि बढ़ई दुखी था...

                                       – केदारनाथ सिंह


Jab raja maraas
Sone ki ek bahut badi arthi banaai gayi
Jis par rakha gaya us ka shav
Shandaar shav jise dekhkar
Koi kah nahin sakta
Ki wah raja nahin hai

Sabse pahle mantri aaya
Aur shav ke saamne
Jhukkar khada ho gaya

Phir purohit aaya
Aur na jaane kya
Kuch der tak hothon mein 
Budbudata raha
Phir haathi aaya
Aur usne sund uthaakar
Shav ke parti sammaan prakat kiya
Phir ghode aye neele-peele
Jo mahaul ki gambhirta ko dekhkar
Tay nahin kar paye
Ki unhen hinhinana chaahiye ya nahin
Phir dheere-dheere
Badhayi
Dhobi
Naai
Kumhar - sab aaye
Aur sab khade ho gaye
Vishal chamchmaati hui arthi ko gherkar

Arthi ke aaspas
Ek ajab-sa dukh tha
Jisme sab dukhi the
Mantri dukhi tha
kyonki haathi dukhi tha
Haathi dukhi tha
Kyonki ghode dukhi the
Ghode dukhi the
Kyonki ghaas dukhi thi
Ghaas dukhi thi
Kyonki badhayi dukhi tha...

                              – Kedarnath Singh



May 16, 2019

Raqt Me Khila Hua Kamal - Kedarnath Singh | Hindi Kavita

रक्त में खिला हुआ कमल | केदारनाथ सिंह


'रक्त में खिला हुआ कमल' कविता केदारनाथ सिंह जी द्वारा लिखी गई एक हिन्दी कविता है।

'अकाल में सारस' केदारनाथ जी की प्रसिद्ध कविता-संग्रहो में से एक है जिसमें यह कविता 'रक्त में खिला हुआ कमल' भी सम्मिलित हैं।


रक्त में खिला हुआ कमल

मेरी हड्डियाँ
मेरी देह में छिपी बिजलियाँ हैं
मेरी देह
मेरे रक्त में खिला हुआ कमल

क्या आप विश्वास करेंगे
यह एक दिन अचानक
मुझे पता चला
जब मैं तुलसीदास को पढ़ रहा था

                                       – केदारनाथ सिंह


Meri haddiyaan
Meri deh mein chhipi bijliyaan hain
Meri deh
Mere raqt mein khila hua kamal

Kya aap vishwaas karenge
Yah ek din achaanak
Mujhe pata chala
Jab main tulsidaas ko padh raha tha.

                                     – Kedarnath Singh